रामधारी सिंह "दिनकर"
रामधारी सिंह दिनकर (1908-1974) हिन्दी के एक प्रमुख लेखक थे। राष्ट्र कवि दिनकर आधुनिक युग के श्रेष्ठ वीर रस के कवि के रूप में स्थापित हैं। बिहार प्रांत के बेगूसराय जिले का सिमरिया घाट कवि दिनकर की जन्मस्थली है। इन्होंने इतिहास, दर्शनशास्त्र और राजनीति विज्ञान की पढ़ाई पटना विश्वविद्यालय से की। साहित्य के रूप में इन्होंने संस्कृत, बंग्ला, अंग्रेजी और उर्दू का गहन अध्ययन किया था। ज्ञानपीठ पुरस्कार विजेता। दिनकरजी के उत्तरवर्ती जीवन में यही दार्शनिकता तथा गूढ़ वैचारिकता गद्य में प्रकट हुई। दिनकर के साहित्यिक जीवन की विशेषता यह थी कि शासकीय सेवा में रहकर राजनीति से संपृक्त रहते हुए भी वे निरंतर स्वच्छंद रूप से साहित्य सृजन करते रहे। उनकी साहित्य चेतना राजनीति से उसी प्रकार निर्लिप्त रही, जिस प्रकार कमल जल में रहकर भी जल से निर्लिप्त रहता है।
युगद्रष्टा साहित्यकार दिनकर ने अपने समय की कठिनाइयों को बड़ी पैनी दृष्टि से देखा व पहचाना। युवा आक्रोश तथा अनुशासनहीनता के लिए उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा-'अनुशासनहीनता वह रोग नहीं, जो कल पैदा हुआ और परसों खत्म हो जाएगा। जब तक शासन के कर्णधार नहीं सुधरेंगे, जब तक ईमानदार कर्मचारी धक्के खाते रहेंगे, बेईमानों को तरक्की मिलती रहेगी, तब तक छात्रों की अनुशासनहीनता भी कायम रहेगी।'
'संस्कृति के चार अध्याय' एक ऐसा विशद, गंभीर खोजपूर्ण ग्रंथ है, जो दिनकरजी को महान दार्शनिक गद्यकार के रूप में प्रतिष्ठित करता है। अध्यात्म, प्रेम, धर्म, अहिंसा, दया, सहअस्तित्व आदि भारतीय संस्कृति के विशिष्ट गुण हैं। दिनकरजी स्पष्ट घोषणा करते हैं- 'आज सारा विश्व जिस संकट से गुजर रहा है, उसका उत्तर बुद्धिवाद नहीं, अपितु धर्म और अध्यात्म है। धर्म सभ्यता का सबसे बड़ा मित्र है। धर्म ही कोमलता है, धर्म दया है, धर्म विश्वबंधुत्व है और शांति है।'
सच ही, अपने काव्य में सागर की सी गर्जना करने वाले, 'उर्वशी' के माध्यम से सुकोमल प्रेम की रसभरी सतरंगी फुहारों में स्नान कराने वाले और गद्य के माध्यम से चिंतन के नए आयाम रचकर काल की सीमाओं का अतिक्रमण करने वाले दिनकर का साहित्य आधुनिक हिन्दी साहित्य की श्रीवृद्धि करने वाला अनुपम आबदार मोती है, जिसे अब भी सच्चे जौहरी की तलाश है।

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